1958 की बात है शहर के श्री मस्त रम, ख़ुशी राम , जय गोपाल व् श्री खेम चाँद और कई प्रेमि, पूज्य बेपरवाह साई जी के दर्शनों के लिए दरबार आये , जैसे के वोह अक्सर आते रहते थे । लेकिन उस दिन जब वह आये तो श्री खेम चाँद ने बेपरवाह जी से यह सवाल कर बैठे के 'साई जी' आप जी के चोला छोड़ने के बाद यहाँ क्या बनेगा? सच्चे दातार वाली दो जहाँ जी ने फ़रमाया , खेमा ! तेरी बात हमें समझ मैं नहीं आयी ।
खेम चाँद ने फिर कहा 'साई जी'! आप जी के बाद यहाँ पर कहीं पूजा वाली जगह न बन जाये के लोग आएं माथा तक, चढ़ावा चढ़ाये और मनोकामना लेकर चले जाये ।
इतना सुनते ही खुद-खुदा वाली दो जहाँ दातार जी ने जोश मैं आकर फ़रमाया, 'खेमा! कितने वर्ष से तु हमारे साथ रह रहा है , तूने हमरे को आदमी ही समझा है।
ये जो सच्चा सौदा बना है ये किसी आदमी ने नहीं बनाया, ये खुद-खुदा सावन शाह साई के हुकुम से बना है, जब तक धरती आसमान रहेगा सच्चे सौदे की तरफ कोई ऊँगली नहीं उठा सकेगा सावन शाह दया जी ने जो हमें नूरी खजाना बक्शा था उसमें से एक पैसे जितना भी हमने खर्च नहीं किया वो सावन शाही खजाना वैसे का वैसा ही दबा पड़ा है हमारे बाद जो ताक़त आये गी हमने तो लोगों मैं सोना चांदी और कपडे ही बांटे है, और वो ताक़त अगर चाहे तोह हीरे जवाहरात भी बाँट सकती है.
हमने तो माकन बनाये और गिराये वो ताक़त चाहे तो बने बनाये मकान आस्मां से धरती पर उतार सकती है सच्चे सौदे मैं इतनी सांगत होगी क हठी पर चढ़ कर दर्शन देंगे पर फिर भी मुश्किल से होंग, सांगत की इतनी भीड़ होगी के सिरसा , बेगू और नेजीअ एक ही हो जाएग, सिरसा से यहाँ तक सांगत ही सांगत नज़र आएगी।

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