"सन्त वचन पलटे नहीं, पलट जाए ब्रह्मंड"
सतगुर ने अगस्त 2017 में पहली बार 7 भंडारे मनाए। सभी खुश थे , पर सतगुर की रमज़ समझ नहीं पाए जैसे हम मूवी के वक़्त नहीं समझ पाए थे, उस वक़्त कुछ तो बस ये कहने में व्यस्त रहे "बाबा का फिल्मों से क्या काम" । क्यों तुमको उस दातार से ज्यादा पता है। वो भूत, वर्तमान, भविष्य सब जनता है , उसे सब पता है मुझे क्या चाहिए क्या नहीं। खैर छोड़ो ये बात, मूवी आखिर बाबा ने क्यों बनाई , अब पता चला । जब पहली मूवी आयी थी तब पिताजी ने कहा था बेटा 100% सच दिखाएंगे। आज पता चल रहा है सब सच था जब हु ब हु हुआ। इसलिए सन्त कुछ भी करे , कहें , चूं चरां नहीं करनी चाहिए, सतवचन कह मान लेनी चाहिए चाहे मन कितना भी भरमाये अन्यथा बाद में पछताने के सिवाय कुछ नहीं बचता।
जैसा कि मैंने शुरुआत में 7 भंडारों का जिक्र किया।ये तो हम सब जानते हैं कि सर का कोई भी कदम बिना वजह नहीं होता जितना हम जानते हैं। पिताजी को पता था आगे क्या होने वाला है इसलिये एडवांस में ही सब काम निपटा दिए , जैसे मूवी एडवांस में बना कर आगे की कहानी दिखा दी और 7 भंडारे।
7 भंडारे -
15 अगस्त का तो मना कर गए थे फिर आते हैं
1. 23 सितम्बर
2. नवम्बर
3. 25 जनवरी
4. 29 अप्रैल
5. 15 अगस्त
6. 23 सितम्बर और
सातवां नवम्बर ।
Note- ((28 फरवरी अगर भंडारे में आता है तो पिताजी 23 नवंबर वाला भंडारा अपने बीच मनाएंगे, अगस्त 2017 में पिताजी कह भी रहे थे कि नवम्बर का भंडारा भी जैसे अगस्त के मनाया है, 3 या 5 दिनों का मनाएंगे))
"सन्त वचन पलटे नहीं, पलट जाए ब्रह्मंड"
"सन्त कहा विरथा न जाए"
वैसे तो सतगुर की रमज़ कोई नहीं जान सकता पर पिताजी सात भंडारों की खुशियां तो बांट कर गए हैं पता था (उन्हें क्या होने वाला है ) वो दातार हमारे बारे इतना सोचते हैं तो आगे आने वाले भंडारों की खुशियों से कैसे वंचित रख सकते हैं।हमें विश्वास है पिताजी 25 जनवरी का भंडारा साध संगत के बीच , साध संगत के साथ मनाएंगे, पूरी कायनात इसकी साक्षी होगी। और जैसा कि हम सब को पता है परमपिताजी का जन्म 25 जनवरी 1919 को हुआ था , अब 25 जनवरी 2019 को स्वर्ण जयंती(गोल्डन जुबली) है, आखिर इस दिन को बब्बर शेर की गर्जना के बगैर मनाना असम्भव सा लगता है।
ऊपर discuss की गई बातों से आंख में आंसू आ जाते हैं सतगुर के हम पर रहमोकरम देख कर और सतगुर दयाल हमारे बारे में कितना सोचते हैं ये देखकर।
उनको पता था क्या होने वाला है सोचा मेरे बच्चों की झोली कहीं खाली ना रह जाये so advance में ही भंडारे मनाकर भंडारों का फल हमारी झोली में डाल गए। वो कितना सोचते हैं हमारे बारे, क्या हम सोचते हैं?
जो ऊपर बताया ये हमारा दृढ़विश्वास है अंधविश्वास नहीं। क्योंकि जैसा कि पिताजी कहते हैं रूहानियत में अंधविश्वास नहीं, दृढ़विश्वास होता है।
सब वचन याद आते रहते हैं अब वचनों का मतलब समझ में आया है
"चाहे कुछ भी करें जतन वापिस तुम्हें ले जाएंगे।
अग्गे नू वधा के पैर पीछे नू हटौणा की
बण के प्रेमी फेर दिल नू डुलोणा की
कट्टा तिंगढ़ दा किल्ले दे जोर ते
तेरे नाल लाइयां मेहरमां ,
नहीं रखदे उमीदां होर ते।
दर दर दे मंगने नालों एक दर दा होके बैजा
वो ऐसा दाता है, जो मर्जी ओह से लैजा
अपना कोई नहीं है जी, अपना सतगुर प्यारा जी
प्रेम कमौणा शेर जगौणा डरपोकों का काम नहीं।
इस रस्ते ओही चल सकदा जेड़ा सब चतुराइयां भूल जावे
ऐडा भोला खसम नहीं जेड़ा मकर चलित्र ना जाणे
चाहे आग में मुझे जलना हो
चाहे कांटों पर मुझे चलना हो
चाहे छोड़ के देश निकलना हो "
सब बातें अब समझ आती हैं।
आखिर में पिताजी के वचन, " इस रस्ते पर चलने के लिए सबसे पहले सतगुर पर दृढ़विश्वाश होना चाहिए फिर सेवा सुमिरन और वचनों का पक्का होना चाहिए।"
"रूहानियत के रस्ते पर अगर आपको कामयाब होना है तो आपको अंधा , बहरा और गूंगा होना पड़ेगा दुनिया की ओर से। बस यही तमन्ना हो ये आंखे देखे तो सतगुर यार मौला को देखे अन्यथा अंधी रहे, कान सुने तो सतगुर के मीठे अनमोल वचन सुने, सतगुर की बातें सुने वरना बहरे ही रहे और ये जुबान जब भी कुछ बोले सतगुर का जिक्र करे नहीं तो गूंगी ही सही। "
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